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Thursday, June 25, 2020

आपातकाल : emergency in India

भारतीय संविधान में तीन प्रकार के आपातकाल की व्यवस्था की गई है ---

(1) राष्ट्रीय आपातकाल ( art - 352)

(2) राष्ट्रपति शासन (art -356)

(3) वित्तीय आपातकाल (art -360)


आज हम बात करेंगे राष्ट्रीय आपातकाल के बारे में ---




आपातकाल की घोसणा निम्न में से किसी भी प्रकार के आधार पर राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है। 
1. युद्ध 
2 . बाह्य आक्रमण और 
3 . सशक्त विद्रोह। 

अनुच्छेद 352 के अंतर्गत बाह्य आक्रमण के आधार पर आपातकाल की प्रथम घोसणा  चीनी आक्रमण के समय 26 अक्टूबर 1962 को की गई थी।  यह उद्घोसणा 10 जनवरी,1968 को वापस ले ली गई थी। 


दूसरी बार राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोसणा बाह्य आक्रमण के आधार पर 3 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान से युद्ध के समय की गई। 

तीसरी बार राष्ट्रीय आपातकाल की घोसणा 25 जून 1975 को आतंरिक गड़बड़ी की आशंका के आधार पर जारी की गई थी। 

दूसरी तथा तीसरी उद्घोषणा मार्च ,1977 में वापस ली गई। 


राष्ट्रीय आपात की उद्घोसणा राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश पर ही करता है। 


आज का दिन यानि 25 जून  भारतीय इतिहास के दृष्टि से बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। 25 जून 1975 के दिन ही भारत में आपातकाल लगाने की घोसणा की गई थी 25 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक भारत में 21 महीने लम्बा आपातकाल लगाया गया था। तब के राष्ट्रपति फकरूद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार की सिफारिश पर आपातकाल लगाया। आपातकाल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत लगाया जाता है। भारत के स्वतन्त्र होने के बाद यह सबसे विवादास्पद काल था। 


आपातकाल लगाने का प्रमुख कारण -


इंदिरा गाँधी ने 1971 के चुनाव में अपनी पार्टी को जबरदस्त जीत दिलाई और खुद भी बड़े अंतर से जीती थी। 
इंदिरा गाँधी की जीत पर सवाल उठाते हुए उनके चुनावी प्रतिद्वंदी राजनारायण ने 1971 में अदालत का रुख किया। राज  नारायण संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार थे ,ये रायबरेली लोकसभा सीट से इंदिरा गाँधी के सामने चुनाव लडे थे इन्होने अपनी याचिका में आरोप लगाया था की इंदिरा गाँधी ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीको का इस्तेमाल किया है। मामले की सुनवाई हुई और इंदिरा के चुनाव को निरस्त कर  दिया गया। 
इसी फैसले से आक्रोशित होकर इंदिरा गाँधी ने इमरजेंसी लगाने का फैसला लिया। 




आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए तथा नागरिक अधिकार समाप्त करके उनके साथ मनमानी की गई। 

नेताओ की गिरफ्तारियां -


आपातकाल लगते ही सभी नागरिको के मौलिक अधिकार ख़त्म हो गए।अभिव्यक्ति का अधिकार ही नहीं रहा ,लोगों के पास जीवन का अधिकार ही नहीं रह गया था।अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नाडीस,जयप्रकाश नारायण, लालकृष्ण आडवाणी,  आदि बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। 
प्रेस पर भी सेंसरशिप लगा दी गई थी। हर अखबार में सेंसर अधिकारी बैठा दिया गया, उसकी अनुमति के बाद ही कोई समाचार छप सकता था। सरकार विरोधी समाचार छापने पर गिरफ्तारी हो सकती थी।यह सब तब थम सका, जब 23 जनवरी, 1977 को मार्च महीने में चुनाव की घोषणा हो गई।

प्रारम्भ में संविधान ने राष्ट्रीय आपातकाल के तीसरे आधार के रूप में  ' आंतरिक गड़बड़ी ' का प्रयोग किया था किन्तु यह शब्द बहुत ही अस्पष्ट था। अतः 44 संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा आंतरिक गड़बड़ी शब्द को ' शस्त्र विद्रोह' शब्द से विस्थापित कर दिया गया। अतः अब आंतरिक गड़बड़ी के आधार पर आपातकाल की घोसणा करना संभव नहीं है , जैसा की 1975 में इंदिरा गाँधी  वाली कांग्रेस सरकार ने किया था। 



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